Saturday, August 15, 2009

++++++++तुम केंद्र बिंदु हो++++++++

यूँ ही रोज़,
हर रोज़,
हर पल,
मैंने कोशिश की,
कि............
कि मैं तुमसे दूर चला जाऊं,
दूर--------कहीं दूर------------बहुत दूर,
और मैं चला भी गया,
मीलों चला,
चलता रहा,
चलता रहा,
चलते चलते पाँव भर आये,
फिर मैंने मुड़कर देखा,
पर यह क्या?
तुम तो मेरे उतने ही करीब हो,
जितने पहले थी,
शायद मुझे पता ही नहीं,
कि मैं उस परिधि पर चल रहा था,
जिसकी तुम केंद्र बिंदु हो,
मैं चाहे जितना भी चलूगा,
चाहे जितना तुमसे दूर जाने कि कोशिश करूंगा,
पर तुमसे उतना ही करीब रहूँगा,
जितना मैं पहले था!

3 comments:

  1. Dil ko chu gayi aapki ye kavita........Padhtey hi seedhey dil mein utar jati hai......Is kavita ko padh kar sahi mein lagta hai ki har kisi ki jindagi mein koi aisa khaas jaror hota hai ki agar wo usse door jana bhi chaey to bhi door nahi jaa saktey balki wo aur bhi karib aa jatey hain.....

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  2. अच्छी कविताएं। लिखते रहो। शुभकामनाएं।

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  3. waah sarkar, jadu hai. Ab teacheri main ja rahe ho bahut time rahega, kavi hi ban jana

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