Saturday, August 15, 2009

*******रेत का परिचय*******

लोग कहते हैं कि,
रेत में घर नहीं बनते!
या,
यूँ कहो कि,
रेत के घर क्षण भ्रंगुर होते हैं!
अच्छा ही है,
कि घर नहीं बनते,
क्योंकि गर घर होंगे,
तो बंधन होंगे,
गर बंधन होगा,
तो विकास नहीं!

घर नहीं बनते तो क्या हुआ,
ये रेत आश्रय तो देती है!
अपने उपर पड़ने वाले,
हर एक पाँव को!
कितनी सहेजता से,
कितनी कोमलता से,
अपने में समेट लेती है!
इसमें मोह नहीं होता,
पर सहृदयता तो होती है!

यह किसी को बंधती नहीं है,
क्योंकि बंधा हुआ मन,
विकास मार्ग पर बढ नहीं सकता!

सत्य है रेत में,
तपन होती है,
पर यह तपन,
तन को जलती है,
मन को नहीं,
ये रेत तो,
मन को शांत करती है,

अब आप को क्या चाहिए,
तन कि शांति,
या मन कि शांति,
ये आप पर निर्भर है!

3 comments:

  1. "RET"....... jise aam jindagi mein hum jaise aam log sukhey se jodtey hain......uska ek kavi ki kalpana ne badi hi khubsoorti se bada hi khubsoorat parichay bhi de diya......... ki "kya hua agar usmey ghar nahi bantey, aashray to deti hai,apney mein sab kuch badi sahajata se samet leti hai,kya hua agar usmey tapan hai to,thandak bhi to deti hai"......... bilkul ek maa ke hirday ki tarah bahar se jitni kathor andar se ek dum utni hi komal.........

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  2. gazab dost...a differnt but really nice perspective...n itni achhi hidi kab se seekh li tumne...sahi hai lage raho

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